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आज मुझे दिल्ली में आए 2 वर्ष हो चुके। कुछ रोजी-रोटी की तलाष या अच्छे कॅरियर का दबाव। यहां हम भागते जा रहे है। कभी बस, कभी आटो, या फिर दिल्ली की जीवन रेखा कही जानी वाली मेट्रो । फिर भी इस भागमभाग में मुस्कराने के पल बेषुमार मिल ही जाते है। मेरा औसतन डेढ़ से दो घंटा मेट्रो में बीतता है। रोज ही अजनबी चेहरे देखता और मुस्कराता आता जाता हूं। इस रोजी की यात्रा में मुझे कुछ षरारती, कुछ सहयोगी या फिर कुछ अडि़यल लोग यहां मिलते रहते है। मेट्रो में बिताये इन्हीं पलों, मिनटों, घंटों को मैं आप सभी के साथ बाटना चाहता हूं। साथ ही अपेक्षा करूंगा कि आप भी मेरे साथ अपने इसी प्रकार के अनुभवों को सभी के साथ बांटे, चाहे जब...मेरे ब्लॉग मेट्रो ..रफ़्तार जिंदगी की...

hmmm Nice yaar keep it up
ReplyDeleteThanks prashant ji...
ReplyDeletebadhai...
ReplyDeletelike your Hindi..its gud..
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