Wednesday, July 20, 2011

मेट्रो चली रेल की चाल.....

क्यों रेल गाड़ी मै इतनी गन्दगी दिखाई देती है .....................क्यों प्लेन इतना साफ़ होता है यही सवाल आज मुझे फिर लिखने पर मजबूर कर रहा है | आप किस तरफ है ? Necessity is mother of invention यही कहते है न |  लोग कही न कही से अपना रास्ता निकल ही लेते है फिर चाहे वो रेल हो प्लेन हो या फिर दिल्ली की शान मेट्रो हो :- मेट्रो मै थूकना एक दंडनीय अपराध है पर एक भाई साहब खाए हुए पान घुश गए मेट्रो मै मैंने सोचा अब ये थुकेगे कहा,
साहब बड़ी बेसब्री से मेट्रो स्टेशन का इन्तजार कर रहे थे अचानक दरवाजा खुला साहब के चहरे पर खुसी उमड़ आयी मै समझ नही पाया की क्यों? उनका फुला हुआ मुह उर उसमे समायी पीक की बड़ी बड़ी लहरे बहार लिकने को मजबूर थी उन्होंने  दरवाजो और स्टेशन के बीचो बीच मै पीक का सागर निकल दिया और चैन की सास ली .... उस दिन से थूकना एक अपराध नही एक रास्ता बन गया लोगो के लिए यही क्रम चलता रहा तो वो दिन दूर नही जब हम भी मेट्रो की तुलना रेल से करने लगेगे ...जागो दिल्ली की जनता बचा लो इस मेट्रो को इन थूकने वालो से ....सिक्यूरिटी क्या चेक करती है पता नही?...खैर ये एक सुरुआत है मेट्रो को गंध करने की पर हम ऐसा होने नही देगे |
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